आईये जानते है कि जब जज दोषी हो तो उसके लिए न्यायिक प्रक्रिया क्या है?

सुप्रीम कोर्ट का जज सभी आपराधिक फैसलों की समीक्षा करता है। एक बार जो फैसला सुप्रीम कोर्ट का जज दे देता है वह सर्वमान्य होता है। लेकिन क्या कभी ऐसा भी हो सकता है कि जज ही अपने खिलाफ आरोपों का सामना करें और वो भी यौन उत्पीड़न। तो इसके लिए जज पर फैसला कौन करता है आईये जानते है इसी के बारे में।

ये मामला उठा है सुप्रीम कोर्ट के मुख्य जज रंजन गोगोई के ऊपर यौन उत्पीड़न का आरोप लगने के बाद। आपको बता दें कि गोगोई ने अपने खिलाफ लगे सभी आरोपों से इंकार किया है।

भारत के संविधान के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट के किसी जज को ऐसे नहीं हटाया जा सकता है। इसके लिए महाभियोग की एक प्रक्रिया का पालन करना पड़ता है। सुप्रीम कोर्ट के जज को पदस्थ करने के लिए संसद के प्रत्येक सदन द्वारा उस सदन की कुल सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से विधेयक पारित होने के बाद इसे राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है। अगर राष्ट्रपति विधेयक पर हस्ताक्षर कर देता है तो सुप्रीम कोर्ट के जज को पदस्थ करने का रास्ता साफ़ हो जाता है।

कई बार जजो ने भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना करना पड़ा। और उनमें से कुछ ने यौन उत्पीड़न के आरोपों का भी सामना भी किया लेकिन आजाद भारत में अभी किसी सुप्रीम कोर्ट के जज को महाभियोग द्वारा नहीं हटाया गया है।

अगर बात की जाए वर्तमान सुप्रीम कोर्ट के जज की तो उन्होंने अपने खिलाफ लगे आरोपों पर सफाई देते हुए कहा था कि आरोप लगाने वाली महिला के पीछे बड़े लोगों का हाथ है वह उन्हें बदनाम करके कोर्ट की आने वाली कार्यवाही को प्रभावित करना चाहते हैं। गोगोई ने अपने खिलाफ आरोपों की जांच के लिए एक सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जजों की समिति बनायीं है जो उनके खिलाफ आरोपों की जांच करेगी।

CJI रंजन गोगोई के खिलाफ एक पूर्व महिला कर्मचारी द्वारा लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों की जांच करने के लिए जस्टिस एस ए बोबडे, एन वी रमना और इंदिरा बनर्जी की एक समिति ने जांच शुरू कर दी है।

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