पुलवामा हमला: सुरक्षा में बड़ी चूक

14 फरवरी २०१९ इस तारीख को शायद ही भारत का इतिहास   कभी भूल पाए। जहा एक तरफ देश में पाश्चात्य सभ्यता सभ्यता  के लाल रंग ने देश को खुशियों से भर दिए था वही दूसरी और सरहद पर खून की होली ने  कफ़न उड़ाने के लिए शव भी सलामत नहीं  छोड़े थे. जम्मू कश्मीर के पुलवामा फिदायदीन हमले मे   मृतक जवानो की संख्या  बढ़ती जा रही है।  CRPF की करीब  70 गाड़ियों का काफिला नेशनल हाईवे से गुज़र रहा था  तभी ८० किलो बिस्फोटक से भरी गाडी टकराते ही ऐसा धमका हुआ जिसने १२ कम तक अपना असर छोड़ा। शहीदों  की संख्या ४४ से ४९ हो गए है।

 अब सवाल ये उठता है कि कब तक देश के जवान यूही  अपनी जान से हाथ धोते रहेंगे ? और मौत भी ऐसी जिससे किसी का भी दिल दहल उठे। जिनके अंतिम संस्कार के लिए शव के टुकड़े भी नसीब नहीं हो  पाए।  IC 814 हाइजैकिंग से लेकर , पार्लियामेंट हमला , बादामी बाघ के फिदाइन धमाकों से लेकर , नगरोटा बसेकंप हमला , श्रीनगर BSF कैंप हमला भारत के बहादुर जवानो ने अपनी जान की कुर्बानी देकर हमारी सुरक्षा की है।  क्या इतने जवान खोने के बाद भी कोई ठोस कदम नहीं उठाया जाएगा? क्या भारत सरकार अपने ही सुरक्षाकर्मियों को सुरक्षित रखने में लगातार नाकमियाबी के सुबूत देती जा रही है?

क्या हमारी सरकार सैन्यसुरक्षा को ध्यान में रखकर प्रतिमा निर्माण की जगह बम धमाके से बचने के लिए बॉडी आर्मर के प्रयोग में नहीं लगा सकती? क्या फौजियों की सुरक्षा हेतु गाड़ियों में बम डिटेक्टर् सिग्नल नहीं लगाए जा सकते? सोचने वाली बात है की ८० किलो बिस्फोटक से भरी गाडी हाईवे की कड़ी सुरक्षा से कैसे चूक गई?अगर बड़े बड़े नेताओं को सुरक्षा कवर प्रदान किया जा सकता है तो पुलवामा में बटालियन को हवाई सुरक्षा क्यों प्रदान नहीं की गई थी? क्या पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे लगाने से , क्या पाकिस्तान के झंडे फाड़ने से इस ह्रदय विदारक घटना से बाहर निकला जा सकता है? क्या अब भी सेन्यसुरक्षा के नाम पर शहीदों के परिवार को मुआवज़ा देकर उनकी कमी पूरी करदी जाएगी ? क्या फिर मोमबत्ती जलाकर नई घटना के इंतज़ार में भारत हाथ पर हाथ रखे बैठा रहेगा ? कब तक ?

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