क्या सड़को पर बढ़ रहे ट्रैफिक के लिए जिम्मेदार हैं बैटरी रिक्शा?

हम सभी जानते हैं कि शहरों में छोटी दूरी का सफर तय करने के लिए बैटरी रिक्शा बहुत ही आरामदायक साधन है। लेकिन कभी कभी इसकी वजह से राहगीरों को परेशानी भी होती है। रिक्शा वाले सवारी भरने के चक्कर में कभी कभी ट्रैफिक का ध्यान नहीं देते है और कहीं भी अपना रिक्शा घुसा देते है। आजकल ऐसा भी देखा गया है पढ़े लिखे लोग भी बैटरी रिक्शा चलाने लगे हैं।
शहरों में दिन ब दिन बैटरी रिक्शों की संख्या बढ़ती जा रही है। बैटरी रिक्शा ने जहाँ कई लोगों को रोजगार प्रदान किया है तो किसी किसी को इसने बेरोजगार भी किया है। इसने सबसे ज्यादा असर पैरों से चलने वाले रिक्शों को चलाने वाले लोगो पर डाला है। इसके बाद इसने ऑटो पर कुछ न कुछ असर जरूर किया है।
सबसे बड़ी बात रिक्शे को कोई भी चलाता है जिसको ड्राइविंग का एक्सपीरियंस होता है वे भी जिन्हें नहीं है वो भी। कभी कभी यह सवारियों के लिए मुश्किल हो जाता है जब कोई नौसिखिया रिक्शा वाला ड्राइव कर रहा होता है। क्योकि बैटरी रिक्शा एक ऑटो के आकर का होता है इसीलिए ड्राइव करते समय यह जरूरी हो जाता है ड्राइवर साइड और गति का बराबर ध्यान रखें नहीं तो दुर्घटना होने में देर नहीं लगती है।
अगर राजनीति के लिहाज से देखा जाए तो रिक्शा वाले नेताओं के लिए चुनाव में लाभदायक होते है। ऐसा देखा गया है कि नेता रिक्शाचालक का वोट पाने के लिए उनके लिए तरह तरह के वादे करते हैं। यह सच है कि आज के समय में बैटरी रिक्शा किसी शहर की परिवहन में रीढ़ की हड्डी बन चुके हैं। लेकिन वजह से ट्रैफिक भी बहुत बढ़ा है।
अगर किराये की बात करें तो इन लोगों का किराया भी फिक्स नहीं रहता है। ये मुह्मांगा दाम मांगते है। ऐसा देखा गया है कि ठीक गंतव्य स्थान पर नहीं पहुंचाते हैं  खासकर दिल्ली जैसे बड़ो शहरों में। किसी गली या चौराहे पर ले जाकर छोड़ देते हैं जबकि पैरो से चलने वाले रिक्शा चालक घर के दरवाजे तक छोड़ कर जाते हैं।
यह सच है बैटरी रिक्शा से कहीं आना जाना सुगम और कम समय लेने वाला हुआ है लेकिन इससे उन गरीब साइकिल रिक्शा चालकों के पेट पर लात मारी गयी है। इसीलिए यह जरूरी है कि सरकार सड़कों उतने ही बैटरी रिक्शा चलने की अनुमति दे जिससे ट्रैफिक न बढ़ें।
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