आखिर ! ये राफेल का पुरा मामला क्या है? क्या राफेल में मोदी सरकार ने 1000 करोड़ के घोटाले किये हैं?

राफेल एक फ्रेंच शब्द है जिसका मतलब तूफ़ान होता है. और इस तूफ़ान ने  भारत की राजनीती में तूफ़ान  मचा दिया है, और आसमान में उड़ने वाले राफेल ने देश के राजनीतिक गलियारों में भी खूब उड़ान भरी. आखिर! राफेल को लेकर सियासत इतनी क्यों गरमाई? और क्या है ये पूरा मामला? आइये बताते है आपको…

बता दें कि राफेल की इस कड़ी की शुरुआत हुई थी 28 अगस्त 2007 को जब डिफेन्स मिनिस्ट्री के प्रपोजल को स्वीकार किया गया,   जिसमें 126 MMRCA की बात हुई थी, और इसी प्रक्रिया को आगे बढ़ाते  हुए 30 जनवरी 2012 को ये फैसला लिया गया कि हमारा देश 126 फाइटर जेट्स खरीदेगा जिसमें से 18 रेडी टू फ्लाई होंगे और बाकी 108, भारत में ही बनाये जायेंगे.

फिर 3 मार्च 2014 को ये बताया गया कि जो एयरक्राफ्ट भारत में बनाये जायेंगे उसमे काम की साझेदारी 70/30 की होगी, यानी की 70% काम  HAL  द्वारा किया जायेगा और 30% काम दसाल्ट के द्वारा, पर ये तोल-मोल खत्म ही नहीं हुई और सरकार बदल गयी.इसके बाद शुरू हुई एक और नई कड़ी, 10 अप्रैल 2015 ये घोषणा की गयी कि राफेल की अब एक नई डील होगी जिसमें 36 एयरक्राफ्ट रेडी टू फ्लाई खरीदें जायेंगे और इस डील से HAL  को हटा दिया गया.

इसके ही बाद पनपा सारा विवाद, विपक्ष ने देश की जनता को बताया कि देश में राफेल को लेकर भाजपा बहुत बड़ा घोटाला कर रही है. इसके साथ ही चौकीदार चोर है के नारे भी लगवाए गए.  2015 में हुयी ये डील आज भी चर्चा की विषय बनी हुई है क्युंकी, विपक्ष का कहना है की इस डील में घोटाला हुआ है. उनका कहना है कि  नई डील में तय की कई विमानों की कीमत पुराने डील से तीन गुना ज्यादा है अर्थात्  विपक्ष का ये सवाल है कि 600 करोड का राफेल, आखिर! 1600 करोड में क्यों ?

वहीं केंद्र सरकार के अनुसार,

राफेल की कीमत- 27 हजार 216 करोड़

स्पेयर पार्ट की कीमत-14 हज़ार 400 करोड़

बदलाव-13 हज़ार 600 करोड़

रख रखाव-2 हजार 824 करोड

कुल, 36 राफेल की डील हुई 58 हज़ार 40 करोड रूपये,  यानि की एक राफेल की कीमत 1612  करोड रूपये होती है. लेकिन विपक्ष राफेल का पीछा नहीं छोड़ना नहीं चाहती और जे.पी.सी की मांग पर  अड़ी हुई है. और जब ये मामला सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर पंहुचा, तो 5 सितम्बर 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर सुनवाई शुरु की और केंद्रीय सरकार से कहा कि इसकी प्राइजिंग से जुड़ी जो भी जानकारी है वो एक सील बंद लिफाफे में डाल कर कोर्ट में प्रस्तुत करे.

और ये सारी जानकारी 12 नवंबर को सुप्रीम को दे दी गयी.  इसके बाद 14 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया और कहा की ये हमारे अधिकार क्षेत्र से बाहर है और इस पर हम कोई फैसला नहीं ले सकते हैं. और तबसे विपक्ष प्रयासरत है कि किसी भी तरीके से सरकार  को राफेल घोटाले के घेरे में ले लिया जाय. जबकि, केंद्र सरकार का मानना है कि राफेल कोई घोटाला है ही नहीं.

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